आधा सच और पूरा झूठ: गिरती साख के बीच सिसकती पत्रकारिता

इतिहास गवाह है कि पत्रकारिता ने समय-समय पर सत्ता के शीर्ष सिंहासनों को झकझोरा है और समाज को नई दिशा दिखाई है। लेकिन वर्तमान परिदृश्य को देखकर मन व्यथित हो जाता है। विशेषकर कोविड-19 की विभीषिका के बाद, डिजिटल मीडिया के विस्तार और सूचना तकनीक के लोकतंत्रीकरण का लाभ उठाकर एक ऐसी अनियंत्रित भीड़ इस क्षेत्र में प्रविष्ट हो गई है, जिसका पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों और नैतिक मूल्यों से कोई सरोकार नहीं है। जहाँ कभी पत्रकारिता की दहलीज पर कदम रखने के लिए वर्षों के अनुभव, अध्ययन और तपस्या की आवश्यकता होती थी, आज मात्र एक स्मार्टफोन और एक फर्जी ‘माइक आईडी’ किसी को भी रातों-रात ‘स्वयंभू संपादक’ बनाने के लिए पर्याप्त है। दुर्भाग्यवश, आज पत्रकारिता का एक बड़ा हिस्सा ‘मिशन’ के मार्ग से भटककर ‘कमीशन’ और अवैध उगाही के व्यवसाय में तब्दील हो चुका है।
इन नव-नवेले और स्वार्थी तत्वों के लिए जनसरोकार और जनहित की खबरें अब गौण हो चुकी हैं। इनका एकमात्र उद्देश्य प्रभावशाली व्यक्तियों, प्रशासनिक अधिकारियों और विभिन्न संस्थानों को अपने छद्म जाल में फंसाना रह गया है। इनकी कार्यशैली अत्यंत कुत्सित और योजनाबद्ध है। पहले किसी संस्थान की बारीकी से रेकी की जाती है, फिर उसकी किसी छोटी सी त्रुटि या विसंगति को तिल का ताड़ बनाकर प्रस्तुत करने की धमकी दी जाती है। यदि संबंधित पक्ष इनके ‘विज्ञापन’ या ‘प्रमोशन’ के नाम पर की जाने वाली अवैध आर्थिक मांग को स्वीकार कर लेता है, तो वही संस्थान रातों-रात आदर्श बन जाता है। इसके विपरीत, यदि कोई इनके अनैतिक दबाव के आगे झुकने से इनकार कर दे, तो शब्दों की बाजीगरी और ‘आधे सच’ को दिखाकर उस व्यक्ति या संस्था के सामाजिक चरित्र हनन का घिनौना खेल शुरू हो जाता है। यह पत्रकारिता नहीं, बल्कि कलम की ओट में की जा रही संगठित ब्लैकमेलिंग है।
एक निष्पक्ष पत्रकार सदैव तथ्यों की गहराई और पूर्णता में विश्वास रखता है, परंतु इन ‘मक्कार मंडलियों’ ने ‘आधे सच’ को अपना सबसे घातक हथियार बना लिया है। किसी के वक्तव्य का एक चुनिंदा हिस्सा काटकर उसे संदर्भ से अलग वायरल करना और जनता के बीच भ्रम फैलाना आज का सबसे बड़ा और खतरनाक व्यापार बन चुका है। हमें यह समझना होगा कि पूर्णतः असत्य को पहचानना सरल है, किंतु ‘आधा सच’ समाज के लिए उस असाध्य रोग की भांति है जो धीरे-धीरे लोकतंत्र की जड़ों को खोखला कर देता है।
इस अनैतिक और गलाकाट स्पर्धा का सर्वाधिक दुष्प्रभाव उन वरिष्ठ और निष्ठावान कलमकारों पर पड़ा है, जिन्होंने पत्रकारिता को अपना धर्म और जीवन का उद्देश्य माना। जो पत्रकार भारत को एक सशक्त, स्वच्छ और जवाबदेह पत्रकारिता देने के स्वप्न के साथ इस क्षेत्र में आए थे, आज वे स्वयं को हाशिए पर खड़ा पा रहे हैं। वे वरिष्ठ पत्रकार जो अपनी ईमानदारी और सेवा के बल पर ससम्मान अपने परिवार का भरण-पोषण करते थे, आज इन ब्लैकमेलरों के कारण गंभीर आर्थिक और मानसिक संकट से जूझ रहे हैं। बाजार में ‘शोर’ और ‘सनसनी’ की मांग बढ़ गई है, जिसके कारण गंभीर और तथ्यपरक लेखन करने वाले मनीषी गुमनाम होते जा रहे हैं। विडंबना यह है कि जब कोई छद्म पत्रकार वसूली या अभद्रता करता है, तो आम जनमानस की दृष्टि में पूरी बिरादरी ‘बिकाऊ’ या ‘दलाल’ मान ली जाती है। यह उन वरिष्ठों के प्रति घोर अन्याय और अपमान है जिन्होंने दशकों तक अपनी साख और लेखनी की पवित्रता को अक्षुण्ण बनाए रखा। आज वे सच्चे और स्वाभिमानी पत्रकार दर-दर भटकने को विवश हैं, क्योंकि वे उस भीड़ का हिस्सा बनने को तैयार नहीं हैं जो नैतिकता की बलि देकर वैभवशाली जीवन जी रही है।
हालाँकि, इस घोर निराशा और अंधकार के बीच आशा की कुछ किरणें अब भी प्रकाशमान हैं। जहाँ एक ओर भ्रष्ट तत्व इस गौरवशाली पेशे को कलंकित कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर इसी दौर में कुछ ऐसे अत्यंत प्रतिभाशाली, नए और स्वतंत्र पत्रकार भी उभरे हैं जिन्होंने अपनी निष्पक्षता और साहस से नई इबारत लिखी है। ये वे युवा कलमकार हैं जो किसी बड़े कॉर्पोरेट मीडिया हाउस के दबाव के बिना, सीमित संसाधनों में भी जमीनी हकीकत को पूरी निर्भीकता के साथ समाज के सम्मुख ला रहे हैं। उन्होंने आधुनिक तकनीक का विवेकपूर्ण उपयोग कर सत्ता और तंत्र से वे प्रश्न पूछे हैं, जिनसे बड़े-बड़े दिग्गजों ने कन्नी काट ली थी। इन ईमानदार और संकल्पित चेहरों की उपस्थिति ही इस बात का प्रमाण है कि पत्रकारिता की मूल चेतना अभी जीवित है।
निष्कर्षतः, अब वह समय आ गया है जब समाज और जागरूक नागरिकों को ‘असली’ और ‘नकली’ के मध्य एक स्पष्ट विभाजक रेखा खींचनी होगी। हमें पहचानना होगा कि कौन समाज की वास्तविक पीड़ा को स्वर दे रहा है और कौन किसी की मजबूरी का लाभ उठाकर अपनी तिजोरियां भर रहा है। वरिष्ठ पत्रकारों के अनुभव और इन नए, सच्चे स्वतंत्र पत्रकारों की ऊर्जा को सम्मिलित होकर एक ऐसे मोर्चे का निर्माण करना होगा जो इन ‘मक्कार मंडलियों’ के नकाब उतार सके। यदि आज हमने इस ‘कलम की डकैती’ को नहीं रोका और अच्छे पत्रकारों का नैतिक समर्थन नहीं किया, तो आने वाली पीढ़ियां हमें इस बात के लिए कभी क्षमा नहीं करेंगी कि जब लोकतंत्र का चतुर्थ स्तंभ ढह रहा था, तब हम मूकदर्शक बने रहे।

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